Sunday, 21 April 2013

माइक्रोमैक्स कैनवास एचडी स्मार्टफोन

माइक्रोमैक्स कैनवास एचडी स्मार्टफोन 
माइक्रोमैक्स कैनवास एचडी स्मार्टफोन 14 फरवरी को लॉन्च होगा. एंड्राइड प्लेटफॉर्म वाले इस फोन की कीमत लगभग 15000 रूपये के आस-पास रहने की उम्मीद है.

माइक्रोमैक्स कैनवास एचडी स्मार्टफोन 
1 जीबी रैम, 8 मेगा-पिक्सल कैमरा के इस फोन में एंड्राइड 4.1 जेली बिन ऑपरेटिंग सिस्टम है. मिड बजट के इस फोन को लेकर यूथ में काफी क्रेज है.

लेनेवो आइडिया पैड Z500

लेनेवो आइडिया पैड Z500
इंडियन लैपटॉप मार्केट में इसे सबसे पतला लैपटॉप माना जा रहा है. बावजूद इसमें 8 जीबी की रैम और 1024 जीबी की हार्ड ड्राइव है.

लेनेवो आइडिया पैड Z500
लेनेवो आइडिया पैड Z500 को थर्ड जेनरेशन का लैपटॉप माना जा रहा है. इसकी कीमत 48990 रूपये है

सैमसंग गैलेक्सी S4

सैमसंग गैलेक्सी S4 स्मार्टफोन 
गैलेक्सी एस4 में कई नए आकर्षक फीचर्स हैं। 13 मेगापिक्सल कैमरे के साथ इस स्मार्टफोन से 4 सेकंड में 100 शॉट लिए जा सकेंगे।
सैमसंग गैलेक्सी S4 स्मार्टफोन 
गैलेक्सी एस4 में आई ट्रैकिंग फीचर भी दिया गया है। इसकी मदद से मोबाइल से नजर हटते ही वीडियो अपने आप रुक जाएगा।

रामायण की ये बातें जानकर आप भी दांतों तले दबा लेंगे अपनी उंगली

19 अप्रैल, शुक्रवार को श्रीराम नवमी का पर्व था। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। भगवान श्रीराम के जीवन का वर्णन यूं तो कई ग्रंथों में मिलता है, लेकिन इन सभी में वाल्मीकि रामायण को ही सबसे सटीक माना गया है।
श्रीराम नवमी के इस शुभ अवसर पर हम आपके लिए लाए हैं वाल्मीकि रामायण के कुछ ऐसे रोचक तथ्य, जो बहुत कम लोग जानते हैं।
1- रामायण महाकाव्य की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की है। इस महाकाव्य में 24 हजार श्लोक, पांच सौ उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड हैं। जिस समय राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था, उस समय उनकी आयु लगभग 60 हजार वर्ष थी।
2- रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। ऋष्यश्रृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया।
उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था।

3- वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में कर्क लग्न में हुआ था। उस समय सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यामान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ गुरु विराजमान थे।
भरत का जन्म पुष्य नक्षत्र तथा मीन लग्न में हुआ था, जबकि लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म आश्वेषा नक्षत्र व कर्क लग्न में हुआ था। उस समय सूर्य अपने उच्च स्थान में विराजमान थे।
4-  तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया, जबकि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में स्वयंवर का वर्णन नहीं है। रामायण के अनुसार जब भगवान राम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुंचे तो  विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा।  
तब भगवान श्रीराम ने खेल ही खेल में उस धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी इस शिव धनुष को उठा लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता का विवाह कर देंगे।
5- श्रीरामचरित मानस के अनुसार सीता स्वयंवर के समय भगवान परशुराम वहां आए थे, जबकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे, तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने  धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम के बाण चढ़ाने देने पर परशुराम वहां से चले गए थे।
6- जिस समय भगवान श्रीराम वनवास गए, उस समय उनकी आयु लगभग 27 वर्ष की थी। राजा दशरथ श्रीराम को वन नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।
7- अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु का आभास भरत को पहले ही एक स्वप्न के माध्यम से हो गया था। सपने में भरत ने राजा दशरथ को काले वस्त्र पहने हुए देखा था। उनके ऊपर पीले रंग की स्त्रियां प्रहार कर रही थीं। सपने में राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की माला पहने और लाल चंदन लगाए गधे जुते हुए रथ पर बैठकर तेजी से दक्षिण (यम की दिशा) की ओर जा रहे थे।
8- हिंदू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के होने की मान्यता है, जबकि रामायण के अरण्यकांड के चौदहवें सर्ग के चौदहवें श्लोक में सिर्फ तैंतीस देवता ही बताए गए हैं। उसके अनुसार बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनी कुमार, ये ही कुल तैंतीस देवता हैं।
09- सीताहरण करते समय जटायु नामक गिद्ध ने रावण को रोकने का प्रयास किया था। रामायण के अनुसार ये जटायु के पिता अरुण बताए गए हैं। ये अरुण ही भगवान सूर्यदेव के रथ के सारथी हैं।
10- ये बात सभी जानते हैं कि लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक-कान काटे जाने से क्रोधित होकर ही रावण ने सीता का हरण किया था, लेकिन स्वयं शूर्पणखा ने भी रावण का सर्वनाश होने का श्राप दिया था, क्योंकि रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिन्न का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।
11- जिस दिन रावण सीता का हरण कर अपनी अशोक वाटिका में लाया, उसी  रात को भगवान ब्रह्मा के कहने पर देवराज इंद्र माता सीता के लिए खीर लेकर आए। पहले देवराज ने अशोक वाटिका में उपस्थित सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया और उसके बाद माता सीता को खीर अर्पित किया, जिसके खाने से सीता की भूख-प्यास शांत हो गई
सभी जानते हैं कि समुद्र पर पुल का निर्माण नल नामक वानर ने किया था। उसे श्राप मिला था कि उसके द्वारा पानी में फेंकी गई वस्तु पानी में डूबेगी नहीं, जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार नल देवताओं के शिल्पी (इंजीनियर) विश्वकर्मा के पुत्र थे और वह स्वयं भी शिल्पकला में निपुण था। अपनी इसी कला से उसने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था।

रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवें दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था।

एक बार रावण जब भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया तो वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

रामायण के अनुसार जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत उठा लिया, तब माता पार्वती भयभीत हो गई थीं और उन्होंने रावण को श्राप दिया था कि तेरी मृत्यु किसी स्त्री के कारण ही होगी।

रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसका नाम वेदवती था। भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी।
रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी। उसी स्त्री दूसरे जन्म में सीता के रूप में जन्म लिया।


अपनी हथेली देखकर पहचानें आपको कौन सी बीमारी है

पुराने समय में रोगी की नब्ज देखकर वैद्य रोग का पता लगा लेते थे। आज के समय में यह तकनीक तो लगभग समाप्त हो चुकी है लेकिन फिर भी किसी भी व्यक्ति की हथेली देखकर उसके स्वास्थ्य के बारे में आसानी से जाना जा सकता है।किसी भी इंसान की गुलाबी, लाल, पीली या सफेद हथेली उसके स्वास्थ्य के बारे में काफी कुछ बता देती है

गुलाबी हथेली
जिन व्यक्तियों की हथेली गुलाबी रंग की होती है, वे आमतौर पर स्वस्थ होते हैं। मौसमी बीमारियां उन्हें अधिक परेशानी नहीं करती। इन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं होती। उम्र के साथ जो रोग लगते हैं, वे भी उनमें काफी समय के बाद दिखाई देते हैं। सामान्यत: गुलाबी हथेली वाले लोग स्वस्थ जीवन जीते 
लाल हथेली 
लाल हथेली वाले व्यक्ति सामान्यत: ब्लड प्रेशर आदि रोगों से पीडि़त रहते हैं। ऐसे लोगों को क्रोध अधिक आता है। लाल हथेली वाले लोगों को कमर दर्द व पेट संबंधी बीमारियां अधिक होने की संभावना रहती है। ये लोग शराब या अन्य किसी मादक पदार्थ के आदि होते हैं। इन्हें हार्ट अटैक, लकवा या मधुमेह रोग होने की संभावना अधिक होती है
सफेद हथेली
जिन लोगों की हथेली सफेद होती है, वे सामान्य तौर पर अस्वस्थ होते हैं। उन्हें कोई न कोई रोग अवश्य रहता है जिसके कारण वे कमजोरी का अनुभव करते हैं। इन लोगों में खून की कमी होती है। एक बार बीमार होने पर इन्हें फिर से स्वस्थ होने में बहुत समय लग जाता है।
पीली हथेली
पीली हथेली वाले लोग भी सामान्यत: स्वस्थ नहीं होते। ये अक्सर किसी न किसी रोग से पीडि़त रहते हैं। इनमें खून की कमी होती है जिसके कारण इनके शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता कम होती है। इन लोगों को पेट से संबंधित बीमारियां भी होती है।
नीली हथेली
नीली हथेली वाले लोग भी स्वस्थ नहीं होते। देखने में तो ये स्वस्थ दिखाई देते हैं परंतु ये किसी अंदरुनी बीमारी से ग्रसित होते हैं। ये ह्रदय संबंधी रोगों से पीडि़त रहते हैं। इनमें नशा करने की प्रवृत्ति भी होती है। नीली हथेली वाले लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है।
काली हथेली
काली हथेली अधिक समय तक रहने वाली गंभीर बीमारी को ओर सूचित करती है। ये लोग जल्दी ही बुढ़े दिखाई देने लगते हैं। इनकी आयु भी सामान्यत: कम होती है। इन्हें एक से अधिक रोग होते हैं जिनके कारण इनका शरीर फल-फूल नहीं पाता।

Friday, 12 April 2013

MURDER 3 FULL MOVIE


WHAT IS TANTRA MANTRA

EVERY ONE KNOW WHAT IS TANTRA MANTRA IF NO TODAY EVERYONE KNOW

हर मुश्किल को पटखनी दे दुर्गासप्तशती का यह चमत्कारी मंत्र


इच्छाएं केवल सोचने से पूरी नहीं होती, बल्कि सोच को व्यवहार में उतार कोशिशों से ही मुमकिन है। धार्मिक उपायों द्वारा शक्ति साधना की कोशिशों को सफल बनाने के लिए देवी उपासना की बड़ी अहमियत है। देवी भक्ति न केवल मनोवांछित बल्कि शीघ्र ही शुभ फल देने वाली मानी गई है। देवी साधना के लिए दुर्गासप्तशती या उसके अचूक मंत्रों का स्मरण श्रेष्ठ  उपाय है।
नवरात्रि शक्ति उपासना की विशेष घड़ी होती है। खासतौर पर दुर्गासप्तशती के अद्भुत मंत्रों में ही एक मंत्र जीवन से जुड़ी हर कामनापूर्ति जैसे धन, धान्य या संतान आदि के साथ उनमें आने वाली बाधाओं का भी अंत करने वाला माना गया है यानी यहां बताया जा रहा मंत्र विशेष माथे से चिंता की सारी लकीरें मिटाने वाला साबित हो सकता है। अगली तस्वीर को क्लिक कर जानिए, यह मंत्र और उसके स्मरण की आसान विधि - 
- नवरात्रि में सुबह और शाम दोनों वक्त इस मंत्र का पाठ किया जा सकता है। स्नान के बाद देवी के किसी भी रूप की लाल वस्त्र पर विराजित मूर्ति या तस्वीर के सामने सुगंधित धूप व घी का दीप जलाकर माता को लाल चंदन लगाकर लाल फूल यथासंभव लाल गुड़हल या गुलाब के फूल अर्पित करें।
- मौसमी फल का भोग लगाएं और कामनापूर्ति की प्रार्थना के साथ नीचे लिखा दुर्गासप्तशती का मंत्र पूर्व या उत्तर दिशा में मुख कर लाल आसन पर बैठ बोलें या स्फटिक की माला से यथाशक्ति जप करें -
सर्वबाधा विर्निमुक्तो धनधान्यसुतान्वित:।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।।
-  मंत्र स्मरण या जप के बाद देवी की दीप व कर्पूर आरती कर क्षमाप्रार्थना करें। 

नवरात्रि में देवी भक्ति के क्यों और कैसे होते हैं शुभ प्रभाव? जानिए कुछ अनजाने पहलू

हर काम में शक्ति की जरूरत होती है। इससे साफ है कि संसार में रचना, पालन और विनाश जैसा अद्भुत काम किसी महाशक्ति द्वारा ही संभव है। हिन्दू धर्म में महाशक्ति का यही स्वरूप आद्यशक्ति के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों के मुताबिक आदि शक्ति परब्रह्म का ही रूप है, जो साकार न होकर भी चर-अचर जगत में फैली कई रूपों व शक्तियों में नजर आती है। 
वेदों में भी देवी ने खुद को हर काम का फल और वैभव देने वाली बताया है। वहीं दुर्गासप्तशती में भी देवी की महिमा का एक मंत्र उजागर करता है कि पूरे ब्रह्माण्ड को शक्ति और ऊर्जा निराकार रूप में आदिशक्ति द्वारा ही मिलती है। लिखा है कि - 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।। 

जिसका मतबल यही है कि पंचतत्वों यानी आकाश, जल, वायु, अग्रि और पृथ्वी सहित सभी प्राणियों में बसी शक्तिरूपा व प्राणदायी देवी को बार-बार मेरा नमस्कार है। साफ है कि देवी ही ब्रह्माण्ड की अधिष्ठात्री है।

जानिए शाम व रात को शिव पूजा के चमत्कारी होने से जुड़ी ये खास बातें


भगवान शिव की उपासना और व्रत के विशेष काल और दिन में प्रदोष तिथि का बहुत महत्व है। प्रदोष काल यानी वह समय विशेष जहां दिन और रात का मिलन होता है। इसमें शिव पूजा का फल सभी सांसारिक इच्छाओं को पूरा करने वाला माना गया है। यही वजह है कि यह दिन, तिथि और व्रत प्रदोष के नाम से ही प्रसिद्ध है। प्रदोष व्रत हर हिन्दू माह के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन या त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है। कुछ मान्यताओं में द्वादशी एवं त्रयोदशी की तिथि को भी प्रदोष तिथि माना गया है। आज भी प्रदोष तिथि है। 
इसी प्रदोष तिथि के बारे में कामनापूर्ति की पूजा पंरपराओं के अलावा क्या आप जानते हैं कि शिव आराधना के लिए प्रदोष काल का इतना महत्व क्यों है? यहां बताए जा रहे हैं इससे जुड़े खास धार्मिक व व्यावहारिक पहलू - 
हिन्दू धर्मग्रंथों में भगवान शिव को तमोगुणी व विनाशक शक्तियों का स्वामी भी माना गया है। रात्रि भी तमोगुणी यानी तम या अंधकार भरी होती है। इसमें तामसी या बुरी शक्तियां हावी मानी जाती हैं, जो सांसारिक जीवों के लिए अशुभ व दुःखदायी मानी गई है। लोक भाषा में इन शक्तियों को ही भूत-पिशाच पुकारा जाता है, शास्त्रों में शिव को इन भूतगणों का ही स्वामी और भूतभावन बताया गया है। इन पर शिव का पूरा नियंत्रण होता है। इसलिए प्रदोष काल में शिव की पूजा इन बुरी शक्तियों के प्रभाव से बचाने वाली होती है। 
इस बात के व्यावहारिक पक्ष को समझें तो असल में, दिन के वक्त सूर्य की ऊर्जा और प्रकाश से शरीर ऊर्जावान बना रहता है, रोग पैदा करने वाले जीव भी निष्क्रिय रहते हैं। शरीर के स्वस्थ होने से मन व आत्मा में सत् यानी अच्छे विचारों के प्रवाह से बुरे या तामसी भावों का असर नहीं होता। शैव ग्रंथों में सूर्य को शिव का ही रूप माना गया है और शिव रूप वेद में भी सूर्य को जगत की आत्मा माना गया है। इस तरह सूर्य रूप शिव के प्रभाव से दिन में बुरी शक्तियां कमजोर हो जाती हैं। 
वहीं दिन ढलते ही सत्वगुणी प्रकाश के जाने और तमोगुणी अंधकार के आने से तन, मन के भावों में बदलाव आता है। बुरे और तामसी भावों के हावी होने से मन, विचार और व्यवहार के दोष भयंकर कलह और संताप पैदा करते हैं। यही दोष पैशाचिक प्रवृत्ति माने जाते हैं। इन पर प्रभावी और तुरंत नियंत्रण के लिए ही रात्रि के आरंभ में यानी प्रदोष काल में आसान उपायों से प्रसन्न होने वाले देवता और भूतों के स्वामी शिव यानी आशुतोष की पूजा बहुत ही शुभ और संकटनाशक मानी गई है। 
इसी भाव और श्रद्धा से यह मान्यता भी प्रचलित है कि शिव रात्रि के स्वामी हैं और प्रदोष काल यानी शाम के वक्त शिव कल्याण भाव से भ्रमण पर निकलते हैं। यहीं नहीं पौराणिक मान्यता भी है कि ज्योर्तिलिंग का प्राकट्य भी अर्द्धरात्रि में माना गया है। संकेत यही है कि अशुभ और बुराई से बचना है तो शुभ और कल्याण की भावनाओं से जुड़ें।

हजारों साल पहले ऋषियों के अविष्कार, पढ़कर रह जाएंगे हैरान


भारत की धरती को ऋषि, मुनि, सिद्ध और देवताओं की भूमि पुकारा जाता है। यह कई तरह के विलक्षण ज्ञान व चमत्कारों से अटी पड़ी है। सनातन धर्म वेद को मानता है। प्राचीन  ऋषि-मुनियों ने घोर तप, कर्म, उपासना, संयम के जरिए वेद में छिपे इस गूढ ज्ञान व विज्ञान को ही जानकर हजारों साल पहले ही कुदरत से जुड़े कई रहस्य उजागर करने के साथ कई अविष्कार किए व युक्तियां बताई। ऐसे विलक्षण ज्ञान के आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक होता है। 
कई ऋषि-मुनियों ने तो वेदों की मंत्र शक्ति को कठोर योग व तपोबल से साधकर ऐसे अद्भुत कारनामों को अंजाम दिया कि बड़े-बड़े राजवंश व महाबली राजाओं को भी झुकना पड़ा। 
जानिए ऐसे ही असाधारण या यूं कहें कि प्राचीन वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों द्वारा किए आविष्कार व उनके द्वारा उजागर रहस्यों को जिनसे आप भी अब तक अनजान होंगे – 
महर्षि दधीचि -
महातपोबलि और शिव भक्त ऋषि थे। वे संसार के लिए कल्याण व त्याग की भावना रख वृत्तासुर का नाश करने के लिए अपनी अस्थियों का दान करने की वजह से महर्षि दधीचि बड़े पूजनीय हुए। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि - 
एक बार देवराज इन्द्र की सभा देवगुरु बृहस्पति आए। अहंकार से चूर इन्द्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर चले गए। देवताओं ने विश्वरूप को अपना गुरू बनाकर काम चलाना पड़ा, किन्तु विश्वरूप देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे देता था। इन्द्र ने उस पर आवेशित होकर उसका सिर काट दिया। विश्वरूप, त्वष्टा ऋषि का पुत्र था उन्होंने क्रोधित होकर इन्द्र को मारने के लिए महाबली वृत्रासुर को पैदा किया। वृत्रासुर के भय से इन्द्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के इधर-उधर भटकने लगे।
ब्रह्मादेव ने वृत्तासुर को मारने के लिए वज्र बनाने के लिए देवराज इन्द्र को तपोबली महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियाँ मांगने के लिये भेजा। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए तीनों लोकों की भलाई के लिए उनकी हड्डियां दान में मांगी। महर्षि दधीचि ने संसार के कल्याण के लिए अपना शरीर दान कर दिया। महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र बना और वृत्रासुर मारा गया। इस तरह एक महान ऋषि के अतुलनीय त्याग से देवराज इन्द्र बचे और तीनों लोक सुखी हो गए। 
आचार्य कणाद - 
परमाणुशास्त्र के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।
भास्कराचार्य -
आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथमें पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि, ‘पृथ्वी आकाशीय  पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है । इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।
आचार्य चरक -
‘चरकसंहिता’ जैसा उपयोगी आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान,  औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज, ह्दय रोग व क्षय रोग जैसी बीमारियों के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर की। 
भारद्वाज -
आधुनिक विज्ञान के मुताबिक राइट बंधुओं ने वायुयान का अविष्कार किया। वहीं हिन्दू धर्म मान्यताओं के मुताबिक कई सदियों पहले ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र के जरिए वायुयान को गायब करने के असाधारण विचार से लेकर, एक ग्रह से दूसरे ग्रह व एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाने के रहस्य उजागर किए। इस तरह ऋषि भारद्वाज को वायुयान का अविष्कारक भी माना जाता है। 
कण्व -
 वैदिक कालीन ऋषियों में कण्व का नाम प्रमुख है। इनके आश्रम में ही राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला और उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था। माना जाता है कि उसके नाम पर देश का नाम भारत हुआ। सोमयज्ञ परंपरा भी को कण्व की देन माने जाते हैं। 
कपिल मुनि -
भगवान विष्णु का पांचवा अवतार माने जाते हैं। इनके पिता  कर्दम ऋषि थे। इनकी माता देवहूती ने विष्णु के समान पुत्र चाहा। इसलिए भगवान विष्णु ने खुद उनके गर्भ से पैदा हुए। कपिल मुनि 'सांख्य दर्शन' के प्रवर्तक माने जाते हैं। इससे जुड़ा प्रसंग है कि जब उनके पिता कर्दम संन्यासी बन जंगल में जाने लगे तो देवहूती खुद के अकेले रह जाने की स्थिति पर दुःख जताया। इस पर ऋषि कर्दम देवहूती को इस बारे में पुत्र से ज्ञान मिलने की बात कही। वक्त निकलने कपिल मुनि ने जो ज्ञान माता को दिया, वही 'सांख्य दर्शन' कहलाता है।
इसी तरह पावन गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने के पीछे भी कपिल मुनि का शाप भी संसार के लिए कल्याणकारी बना। इससे जुड़ा प्रसंग है कि भगवान राम के पूर्वज राजा सगर ने द्वारा किए गए यज्ञ का घोड़ा इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के करीब छोड़ दिया। तब घोड़े को खोजते हुआ वहां पहुंचे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। इससे कुपित होकर मुनि ने राजा सगर के सभी पुत्रों को शाप देकर भस्म कर दिया। बाद के कालों में राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या कर स्वर्ग से गंगा को जमीन पर उतारा और पूर्वजों को शापमुक्त किया। 
पतंजलि -
आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले हीं ऋषि पतंजलि ने कैंसर को रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है। 
शौनक :  
वैदिक आचार्य और ऋषि शौनक ने गुरु-शिष्य परंपरा व संस्कारों को इतना फैलाया कि उनको दस हजार शिष्यों के गुरुकूल वाले कुलपति होने का गौरव मिला। शिष्यों की यह तादाद कई आधुनिक विश्वविद्यालयों तुलना में भी कहीं ज्यादा थी। 
महर्षि सुश्रुत - ये शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है। 
जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद, पथरी,  हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे। 
वशिष्ठ :
वशिष्ठ ऋषि राजा दशरथ के कुलगुरु थे। दशरथ के चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने इनसे ही शिक्षा पाई। देवप्राणी व मनचाहा वर देने वाली कामधेनु गाय वशिष्ठ ऋषि के पास ही थी।
विश्वामित्र :
विश्वामित्र, ऋषि बनने से पहले क्षत्रिय थे। किंतु ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को पाने के लिए हुए युद्ध में मिली हार के बाद तपस्वी हो गए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से अस्त्र विद्या पाई। इसी कड़ी में माना जाता है कि आज के युग में प्रचलित प्रक्षेपास्त्र या मिसाइल प्रणाली हजारों साल पहले विश्वामित्र ने ही खोजी थी। 
ऋषि विश्वामित्र ही ब्रह्म गायत्री मंत्र के दृष्टा माने जाते हैं। विश्वामित्र का अप्सरा मेनका पर मोहित होकर तपस्या भंग होना भी प्रसिद्ध है। शरीर सहित त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का चमत्कार भी विश्वामित्र ने तपोबल से कर दिखाया
महर्षि अगस्त्य -
वैदिक मान्यता के मुताबिक मित्र और वरूण देवताओं का दिव्य तेज यज्ञ कलश में मिलने से उसी कलश के बीच से तेजस्वी महर्षि अगस्त्य प्रकट हुए। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी ऋषि थे। उनके तपोबल से जुड़ी पौराणिक कथा है कि एक बार जब समुद्री राक्षसों से प्रताड़ित होकर देवता महर्षि अगस्त्य के पास सहायता के लिए पहुंचे तो महर्षि ने देवताओं के दुःख को दूर करने के लिए समुद्र का सारा जल पी लिया। जिससे सारे राक्षसों का अंत हुआ।
गर्गमुनि -
गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। वे गर्गमुनि ही थे, जिनकी श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के के बारे नक्षत्र विज्ञान के आधार पर  जो कुछ भी बताया वह पूरी तरह सही साबित हुआ। मानवीय पहलू से कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी । इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था, यही तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्गमुनिजी ने पहले बता दिए थे। 
बौद्धयन -
भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह रके कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया|