Wednesday, 2 October 2013

गाय रोती हुई दिखे तो हो सकती है अनहोनी, शुभ संकेत भी देती है गाय

शास्त्रों में गाय को माता कहा है। गाय एक बहुपयोगी पशु है जो कि कई रूपों में फायदेमंद भी है। पुराने समय में सभी के घरों में गाय अनिवार्य रूप से होती थी। आज भी गांव में रहने वाले या ग्रामीण परिवेश से संबंधित लोगों के यहां गाय अवश्य रहती है।
हिंदू धर्म ग्रंथों में गाय बहुत ही पवित्र और पूज्यनीय मानी गई है। ऐसा माना जाता है कि गाय की पूजा करने से सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है। गाय को घर में रखने से कई फायदे होते हैं साथ ही गाय से जुड़े कई शकुन-अपशकुन भी हमारे समाज में प्रचलित हैं।

 यदि जाते समय गाय रोती दिखाई दे तो यात्रा में व्यक्ति के साथ कुछ अनिष्ट होने की संभावना बनती है। जब गाय के ऊपर अत्यधिक मक्खियां बैठने लगे तो अच्छी वर्षा की संभावना बनती है।
इसके विपरीत किसी प्रवासी की आधी रात या दिन के समय गाय रंभाती दिखाई दे तो उसको यात्रा में भयजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। 
 यात्रा करते समय बाईं ओर गाय का स्वर सुनना शुभ रहता है, रात में यदि गाय हुंकार भरती है तो यह भी शुभ शकुन माना जाता है।
 यात्रा पर जा रहे व्यक्ति को यदि गाय अपने खुरों से जमीन खुरचती दिखाई दे तो आने वाले समय में उस व्यक्ति को रोग घेर लेता है।
यदि यात्री को अपने बछड़े से मिलने के लिए उतावली गाय रंभाती दिखे तो उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
गाय जहां रहती है वहां किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय नहीं हो पाती और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती रहती है। गाय से निकलने वाली गंध से वातावरण में मौजूद कई हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
 गाय का दूध भी कई बीमारियों में औषधि का काम करता है। गाय को घर में रखने से सभी प्रकार के ज्योतिष दोष और वास्तु दोष भी नष्ट हो जाते हैं।
 गाय का मूत्र कई बीमारियों में औषधि के रूप काम लिया जाता है। गौमूत्र से कैंसर का इलाज हो जाता है। गाय के प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति को कभी ऐसी कोई भी बीमारी नहीं होती। गाय का गोबर भी कई कामों में उपयोग किया जाता है।

आपके चेहरे का ये हिस्सा भी बता देता है स्वभाव और ज्योतिष की खास बातें

क्या आप जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के गालों का रंग देखकर भी उसका स्वभाव मालूम किया जा सकता है? जी हां, यह संभव है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शरीर के अंगों की बनावट को देखते हुए किसी भी व्यक्ति के स्वभाव, हाव-भाव और आदतों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। जिन ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव हमारे ऊपर सर्वाधिक होता है उसी के अनुसार हमारे अंग बनते हैं और उसी के अनुसार स्वभाव होता है।

गालों का रंग सफेद- जिन लोगों के गालों का रंग सफेद होता है वे अक्सर अस्वस्थ रहते हैं। ऐसे लोग किसी न किसी बीमारी से त्रस्त रहते हैं। इन्हें निराशा रहती है और आलसी भी हो सकते हैं। इन लोगों में अनिश्चितता की भावना अधिक होती है। हर कार्य को अपने ही ढंग से करना पसंद करते हैं।
गालों का रंग गुलाबी- जिन लोगों के गालों का रंग गुलाबी दिखाई देता है वे लोग संतुलित मानसिकता के होते हैं। किसी भी परिस्थिति में खुद को बहुत अच्छे से सेट कर लेते हैं। हर कार्य को करने की इनकी एक विशेष शैली होती है। इन लोगों को जीवन में कई उपलब्धियां हासिल होती हैं।
गालों का रंग लाल- जिन लोगों के गालों का रंग लाल है वे लोग थोड़े गुस्से वाले होते हैं। छोटी-छोटी बातों में ही इन्हें क्रोध आ जाता है। ये लोग साहसी, युद्धप्रिय व उत्तेजित व्यक्तित्व के होते हैं। ये लोग किसी भी कार्य को बहुत अच्छे ढंग से पूर्ण करते हैं।
यदि गालों का रंग गेहुंआ या काला है तो ऐसे जातक हृदय रोगी, मद्यप्रिय, निम्न विचारधारा के हो सकते हैं।
भरे हुए गाल- ऐसे जातक जिनके गाल अधिक भरे हुए होते हैं वे स्थूल शरीर वाले, भोगी, समृद्ध तथा विलासी होते हैं। उनका मानसिक विकास शरीर की अपेक्षा कम होता है।
यदि जातक के गाल सामान्य मांसल यानी भरे हुए, चिकने एवं तेज लिए हुए होते हैं तो जातक में शारीरिक व मानसिक शक्ति संतुलित होती है। उनमें आकर्षण, प्रभाव व व्यावहारिकता के गुण भी होते हैं।
सुखे गाल- जिन लोगों के गाल सुखे और रूखे होते हैं वे असंतुलित आहार, मानसिक चिंता एवं द्वेष प्रवृत्ति वाले होते हैं। ऐसे जातक क्रोधी, चिड़चिड़े व जीवन में कई बार असफल होते हैं।
निम्न गाल- इस प्रकार के गाल सामान्य मांसल, गुलाबी रंग के व चिकने होते हैं। ऐसे गाल जातक के सौंदर्य, सहनशीलता, चातुर्य, परिश्रम, उदारता, विपरीत यौन आकर्षण एवं समृद्धि के परिचायक होते हैं।
गालों का रंग पीला होना: यह अस्वस्थता का प्रतीक है। गालों का रंग पीला होने से व्यक्ति में जीवन शक्ति  की कमी पाई जाती है। ऐसे जातक उत्साहहीन व सदैव भयभीत रहने वाले होते हैं।
ध्यान रखें- किसी भी व्यक्ति के संबंध में सटीक भविष्यवाणी करने के लिए उसके विषय में गहराई से अध्ययन करने की आवश्यकता होती है। तभी सटीक जानकारी प्राप्त की जा सकती है। शरीर के अन्य अंगों की बनावट से व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन भी आ सकता है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

नवरात्रि शनिवार से: 147 साल बन रहे हैं खास योग, ये हैं 12 राशियों पर असर

तुला- इस नवरात्रि में इस राशि के लोगों को धनलाभ होगा। सुखपूर्वक समय व्यतीत होगा। जो लोग बेरोजगार हैं उन्हें रोजगार की प्राप्ति होगी और सुख मिलेगा। तुला राशि के लोगों को महागौरी की पूजा-आराधना से विशेष फल प्राप्त होते हैं। काली चालीसा या सप्तशती के प्रथम चरित्र का पाठ करें। यह जन-कल्याणकारी हैं। अविवाहित कन्याओं को मां की आराधना से उत्तम वर की प्राप्ति होती है।
वृश्चिक- सगे-संबंधियों से मुलाकात होगी। घर-परिवार का सहयोग मिलेगा। अतिथियों को आगमन होगा एवं प्रसन्नता बनी रहेगी। वृश्चिक राशि के लोगों को स्कंदमाता की उपासना श्रेष्ठ फल प्रदान करती है। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। माता इस रूप में वात्सल्य भाव रखती हैं।
धनु- इस नवरात्रि में आपको हर्षदायक समाचारों की प्राप्ति होगी। आपका प्रभाव बढ़ेगा एवं खुशियों में वृद्धि होगी। इस राशिवालों को मां चंद्रघंटा की उपासना करनी चाहिए। माता मंत्रों का यथाविधि अनुष्ठान करें। मंदिर का घंटा प्रतीक है उस ब्रह्मनाद का, जो साधक के भय एवं विघ्नों को अपनी ध्वनि से नष्ट कर देता है।
मकर- आपको मां की भक्ति के दिनों में मित्रों एवं सहयोगियों का साथ मिलेगा। आप परिवार की आवश्यकता की पूर्ति में सफल होंगे। मकर राशि के जातकों के लिए कालरात्रि की पूजा सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। नर्वाण मंत्र का जप करें। मां कालरात्रि अंधकार में भक्तों का मार्गदर्शन करती हैं और प्राकृतिक प्रकोप, अग्निकांड आदि का शमन करती हैं। वे शत्रु संहारक हैं।
कुंभ- इस नवरात्रि में कुंभ राशि के लोगों को मनचाही जगह जाने का मौका मिलेगा। वाहन सुख की प्राप्ति होगी। कार्य में आ रही बाधाएं दूर हो जाएंगी। कुंभ राशि वाले व्यक्तियों के लिए कालरात्रि की उपासना लाभदायक। देवी कवच का पाठ करें।
मीन- धार्मिक अनुष्ठानों एवं आयोजनों में शामिल होने का अवसर मिलेगा। सभी ओर से खुशियों की प्राप्ति होगी। मीन राशि के लोगों को मां चंद्रघंटा की उपासना करनी चाहिए। हरिद्रा की माला से यथासंभव बगलामुखी मंत्र का जप करें।

नवरात्रि शनिवार से: 147 साल बन रहे हैं खास योग, ये हैं 12 राशियों पर असर

दिनांक 5 अक्टूबर 2013 शनिवार से नवरात्रि की शुरुआत हो रही है। शनि वर्तमान में अपनी उच्च तुला राशि में विराजमान है। साथ में राहु भी स्थित है। यह एक खास योग है। इस प्रकार की ग्रह स्थिति और नवरात्रि का योग 147 वर्ष पहले बना था। आने वाले समय शनि-राहु की तुला राशि में युति के साथ नवरात्रि का योग 148 वर्ष बाद सन 2161 में बनेगा।

आने वाले समय में फसलों की अच्छी आवक होगी एवं कारोबार में रौनक बनी रहेगी। किसानों को लाभ होगा एवं जनमानस में उत्साह एवं खुशियां रहेंगी। वर्षा के योग भी कहीं-कही बनेंगे। मूल्यवान धातुओं के भाव में तेजी-मंदी चलती रहेगी। जनता एवं सरकार के मध्य संघर्ष जारी रहेगा।शनि के प्रभाव से मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, छत्तीसगढ़ के होने वाले चुनावों में सत्तासीन पार्टियों को कड़ी मेहनत करना होगी।

मेष- शनि की पूर्ण दृष्टि एवं नवरात्रि का योग अच्छे खान-पान के साथ भरपूर उत्साह बनाए रखेगा। इस राशि के लोगों को स्कंद माता की विशेष उपासना करनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। स्कंदमाता करुणामयी हैं, जो वात्सल्यता का भाव रखती हैं।
वृषभ- आपके लिए भ्रमण, दर्शन एवं धार्मिक कार्यों में सम्मिलित होने के योग बन रहे हैं। परिवार के साथ वक्त बितेगा। वृषभ राशि के लोगों को दुर्गा के महागौरी स्वरूप की उपासना से विशेष फल प्राप्त होते हैं। ललिता सहस्र नाम का पाठ करें। यह जन-कल्याणकारी हैं। अविवाहित कन्याओं को मां की आराधना से उत्तम वर की प्राप्ति होती है।
मिथुन- इस राशि के लोगों को अच्छी आय प्राप्त होगी जिससे जीवन में सुधार होगा। बुरी लत से छुटकार मिलेगा। संपदा का लाभ होगा। इस राशि के लोगों को देवी-यंत्र स्थापित कर ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए। साथ ही तारा कवच का रोज पाठ करें। मां ब्रह्मचारिणी ज्ञान प्रदाता, विद्या के अवरोध दूर करती हैं।
कर्क- आपके लिए किसी बड़े कार्य के बनने के आसार बन रहे हैं। पुरानी मुसीबतों से छुटकारा मिलेगा। कर्क राशि के लोगों को शैलपुत्री की पूजा-उपासना करनी चाहिए। लक्ष्मी सहस्रनाम का पाठ करें। भगवती की वरद मुद्रा अभय दान प्रदान करती हैं।
सिंह- इस नवरात्रि में आपके लिए आनंददायक समय रहेगा। व्यापार में नए संबंध बनेंगे, जो कि आपके लिए लाभ के योग बनाएंगे। आपके सम्मान में वृद्धि होगी। सिंह राशि के लिए मां कूष्मांडा की साधना विशेष फल प्रदान करने वाली है। दुर्गा मंत्रों का जप करें।
कन्या- उत्साह उमंग का वातावरण बना रहेगा। नवरात्रि में खरीददारी एवं घुमने-फिरने में समय गुजरेगा। इस राशि के लोगों को ब्रह्मचारिणी का पूजन करना चाहिए। लक्ष्मी मंत्रों का सविधि जप करें। विद्या ज्ञान प्रदान करती हुई कार्य के सभी अवरोधों को दूर करती हैं। विद्यार्थियों हेतु देवी की साधना फलदायी है।

Sunday, 21 April 2013

माइक्रोमैक्स कैनवास एचडी स्मार्टफोन

माइक्रोमैक्स कैनवास एचडी स्मार्टफोन 
माइक्रोमैक्स कैनवास एचडी स्मार्टफोन 14 फरवरी को लॉन्च होगा. एंड्राइड प्लेटफॉर्म वाले इस फोन की कीमत लगभग 15000 रूपये के आस-पास रहने की उम्मीद है.

माइक्रोमैक्स कैनवास एचडी स्मार्टफोन 
1 जीबी रैम, 8 मेगा-पिक्सल कैमरा के इस फोन में एंड्राइड 4.1 जेली बिन ऑपरेटिंग सिस्टम है. मिड बजट के इस फोन को लेकर यूथ में काफी क्रेज है.

लेनेवो आइडिया पैड Z500

लेनेवो आइडिया पैड Z500
इंडियन लैपटॉप मार्केट में इसे सबसे पतला लैपटॉप माना जा रहा है. बावजूद इसमें 8 जीबी की रैम और 1024 जीबी की हार्ड ड्राइव है.

लेनेवो आइडिया पैड Z500
लेनेवो आइडिया पैड Z500 को थर्ड जेनरेशन का लैपटॉप माना जा रहा है. इसकी कीमत 48990 रूपये है

सैमसंग गैलेक्सी S4

सैमसंग गैलेक्सी S4 स्मार्टफोन 
गैलेक्सी एस4 में कई नए आकर्षक फीचर्स हैं। 13 मेगापिक्सल कैमरे के साथ इस स्मार्टफोन से 4 सेकंड में 100 शॉट लिए जा सकेंगे।
सैमसंग गैलेक्सी S4 स्मार्टफोन 
गैलेक्सी एस4 में आई ट्रैकिंग फीचर भी दिया गया है। इसकी मदद से मोबाइल से नजर हटते ही वीडियो अपने आप रुक जाएगा।

रामायण की ये बातें जानकर आप भी दांतों तले दबा लेंगे अपनी उंगली

19 अप्रैल, शुक्रवार को श्रीराम नवमी का पर्व था। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। भगवान श्रीराम के जीवन का वर्णन यूं तो कई ग्रंथों में मिलता है, लेकिन इन सभी में वाल्मीकि रामायण को ही सबसे सटीक माना गया है।
श्रीराम नवमी के इस शुभ अवसर पर हम आपके लिए लाए हैं वाल्मीकि रामायण के कुछ ऐसे रोचक तथ्य, जो बहुत कम लोग जानते हैं।
1- रामायण महाकाव्य की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की है। इस महाकाव्य में 24 हजार श्लोक, पांच सौ उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड हैं। जिस समय राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था, उस समय उनकी आयु लगभग 60 हजार वर्ष थी।
2- रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। ऋष्यश्रृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया।
उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था।

3- वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में कर्क लग्न में हुआ था। उस समय सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यामान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ गुरु विराजमान थे।
भरत का जन्म पुष्य नक्षत्र तथा मीन लग्न में हुआ था, जबकि लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म आश्वेषा नक्षत्र व कर्क लग्न में हुआ था। उस समय सूर्य अपने उच्च स्थान में विराजमान थे।
4-  तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया, जबकि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में स्वयंवर का वर्णन नहीं है। रामायण के अनुसार जब भगवान राम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुंचे तो  विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा।  
तब भगवान श्रीराम ने खेल ही खेल में उस धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी इस शिव धनुष को उठा लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता का विवाह कर देंगे।
5- श्रीरामचरित मानस के अनुसार सीता स्वयंवर के समय भगवान परशुराम वहां आए थे, जबकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे, तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने  धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम के बाण चढ़ाने देने पर परशुराम वहां से चले गए थे।
6- जिस समय भगवान श्रीराम वनवास गए, उस समय उनकी आयु लगभग 27 वर्ष की थी। राजा दशरथ श्रीराम को वन नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।
7- अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु का आभास भरत को पहले ही एक स्वप्न के माध्यम से हो गया था। सपने में भरत ने राजा दशरथ को काले वस्त्र पहने हुए देखा था। उनके ऊपर पीले रंग की स्त्रियां प्रहार कर रही थीं। सपने में राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की माला पहने और लाल चंदन लगाए गधे जुते हुए रथ पर बैठकर तेजी से दक्षिण (यम की दिशा) की ओर जा रहे थे।
8- हिंदू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के होने की मान्यता है, जबकि रामायण के अरण्यकांड के चौदहवें सर्ग के चौदहवें श्लोक में सिर्फ तैंतीस देवता ही बताए गए हैं। उसके अनुसार बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनी कुमार, ये ही कुल तैंतीस देवता हैं।
09- सीताहरण करते समय जटायु नामक गिद्ध ने रावण को रोकने का प्रयास किया था। रामायण के अनुसार ये जटायु के पिता अरुण बताए गए हैं। ये अरुण ही भगवान सूर्यदेव के रथ के सारथी हैं।
10- ये बात सभी जानते हैं कि लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक-कान काटे जाने से क्रोधित होकर ही रावण ने सीता का हरण किया था, लेकिन स्वयं शूर्पणखा ने भी रावण का सर्वनाश होने का श्राप दिया था, क्योंकि रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिन्न का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।
11- जिस दिन रावण सीता का हरण कर अपनी अशोक वाटिका में लाया, उसी  रात को भगवान ब्रह्मा के कहने पर देवराज इंद्र माता सीता के लिए खीर लेकर आए। पहले देवराज ने अशोक वाटिका में उपस्थित सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया और उसके बाद माता सीता को खीर अर्पित किया, जिसके खाने से सीता की भूख-प्यास शांत हो गई
सभी जानते हैं कि समुद्र पर पुल का निर्माण नल नामक वानर ने किया था। उसे श्राप मिला था कि उसके द्वारा पानी में फेंकी गई वस्तु पानी में डूबेगी नहीं, जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार नल देवताओं के शिल्पी (इंजीनियर) विश्वकर्मा के पुत्र थे और वह स्वयं भी शिल्पकला में निपुण था। अपनी इसी कला से उसने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था।

रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवें दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था।

एक बार रावण जब भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया तो वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

रामायण के अनुसार जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत उठा लिया, तब माता पार्वती भयभीत हो गई थीं और उन्होंने रावण को श्राप दिया था कि तेरी मृत्यु किसी स्त्री के कारण ही होगी।

रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसका नाम वेदवती था। भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी।
रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी। उसी स्त्री दूसरे जन्म में सीता के रूप में जन्म लिया।


अपनी हथेली देखकर पहचानें आपको कौन सी बीमारी है

पुराने समय में रोगी की नब्ज देखकर वैद्य रोग का पता लगा लेते थे। आज के समय में यह तकनीक तो लगभग समाप्त हो चुकी है लेकिन फिर भी किसी भी व्यक्ति की हथेली देखकर उसके स्वास्थ्य के बारे में आसानी से जाना जा सकता है।किसी भी इंसान की गुलाबी, लाल, पीली या सफेद हथेली उसके स्वास्थ्य के बारे में काफी कुछ बता देती है

गुलाबी हथेली
जिन व्यक्तियों की हथेली गुलाबी रंग की होती है, वे आमतौर पर स्वस्थ होते हैं। मौसमी बीमारियां उन्हें अधिक परेशानी नहीं करती। इन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं होती। उम्र के साथ जो रोग लगते हैं, वे भी उनमें काफी समय के बाद दिखाई देते हैं। सामान्यत: गुलाबी हथेली वाले लोग स्वस्थ जीवन जीते 
लाल हथेली 
लाल हथेली वाले व्यक्ति सामान्यत: ब्लड प्रेशर आदि रोगों से पीडि़त रहते हैं। ऐसे लोगों को क्रोध अधिक आता है। लाल हथेली वाले लोगों को कमर दर्द व पेट संबंधी बीमारियां अधिक होने की संभावना रहती है। ये लोग शराब या अन्य किसी मादक पदार्थ के आदि होते हैं। इन्हें हार्ट अटैक, लकवा या मधुमेह रोग होने की संभावना अधिक होती है
सफेद हथेली
जिन लोगों की हथेली सफेद होती है, वे सामान्य तौर पर अस्वस्थ होते हैं। उन्हें कोई न कोई रोग अवश्य रहता है जिसके कारण वे कमजोरी का अनुभव करते हैं। इन लोगों में खून की कमी होती है। एक बार बीमार होने पर इन्हें फिर से स्वस्थ होने में बहुत समय लग जाता है।
पीली हथेली
पीली हथेली वाले लोग भी सामान्यत: स्वस्थ नहीं होते। ये अक्सर किसी न किसी रोग से पीडि़त रहते हैं। इनमें खून की कमी होती है जिसके कारण इनके शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता कम होती है। इन लोगों को पेट से संबंधित बीमारियां भी होती है।
नीली हथेली
नीली हथेली वाले लोग भी स्वस्थ नहीं होते। देखने में तो ये स्वस्थ दिखाई देते हैं परंतु ये किसी अंदरुनी बीमारी से ग्रसित होते हैं। ये ह्रदय संबंधी रोगों से पीडि़त रहते हैं। इनमें नशा करने की प्रवृत्ति भी होती है। नीली हथेली वाले लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है।
काली हथेली
काली हथेली अधिक समय तक रहने वाली गंभीर बीमारी को ओर सूचित करती है। ये लोग जल्दी ही बुढ़े दिखाई देने लगते हैं। इनकी आयु भी सामान्यत: कम होती है। इन्हें एक से अधिक रोग होते हैं जिनके कारण इनका शरीर फल-फूल नहीं पाता।

Friday, 12 April 2013

MURDER 3 FULL MOVIE


WHAT IS TANTRA MANTRA

EVERY ONE KNOW WHAT IS TANTRA MANTRA IF NO TODAY EVERYONE KNOW

हर मुश्किल को पटखनी दे दुर्गासप्तशती का यह चमत्कारी मंत्र


इच्छाएं केवल सोचने से पूरी नहीं होती, बल्कि सोच को व्यवहार में उतार कोशिशों से ही मुमकिन है। धार्मिक उपायों द्वारा शक्ति साधना की कोशिशों को सफल बनाने के लिए देवी उपासना की बड़ी अहमियत है। देवी भक्ति न केवल मनोवांछित बल्कि शीघ्र ही शुभ फल देने वाली मानी गई है। देवी साधना के लिए दुर्गासप्तशती या उसके अचूक मंत्रों का स्मरण श्रेष्ठ  उपाय है।
नवरात्रि शक्ति उपासना की विशेष घड़ी होती है। खासतौर पर दुर्गासप्तशती के अद्भुत मंत्रों में ही एक मंत्र जीवन से जुड़ी हर कामनापूर्ति जैसे धन, धान्य या संतान आदि के साथ उनमें आने वाली बाधाओं का भी अंत करने वाला माना गया है यानी यहां बताया जा रहा मंत्र विशेष माथे से चिंता की सारी लकीरें मिटाने वाला साबित हो सकता है। अगली तस्वीर को क्लिक कर जानिए, यह मंत्र और उसके स्मरण की आसान विधि - 
- नवरात्रि में सुबह और शाम दोनों वक्त इस मंत्र का पाठ किया जा सकता है। स्नान के बाद देवी के किसी भी रूप की लाल वस्त्र पर विराजित मूर्ति या तस्वीर के सामने सुगंधित धूप व घी का दीप जलाकर माता को लाल चंदन लगाकर लाल फूल यथासंभव लाल गुड़हल या गुलाब के फूल अर्पित करें।
- मौसमी फल का भोग लगाएं और कामनापूर्ति की प्रार्थना के साथ नीचे लिखा दुर्गासप्तशती का मंत्र पूर्व या उत्तर दिशा में मुख कर लाल आसन पर बैठ बोलें या स्फटिक की माला से यथाशक्ति जप करें -
सर्वबाधा विर्निमुक्तो धनधान्यसुतान्वित:।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।।
-  मंत्र स्मरण या जप के बाद देवी की दीप व कर्पूर आरती कर क्षमाप्रार्थना करें। 

नवरात्रि में देवी भक्ति के क्यों और कैसे होते हैं शुभ प्रभाव? जानिए कुछ अनजाने पहलू

हर काम में शक्ति की जरूरत होती है। इससे साफ है कि संसार में रचना, पालन और विनाश जैसा अद्भुत काम किसी महाशक्ति द्वारा ही संभव है। हिन्दू धर्म में महाशक्ति का यही स्वरूप आद्यशक्ति के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों के मुताबिक आदि शक्ति परब्रह्म का ही रूप है, जो साकार न होकर भी चर-अचर जगत में फैली कई रूपों व शक्तियों में नजर आती है। 
वेदों में भी देवी ने खुद को हर काम का फल और वैभव देने वाली बताया है। वहीं दुर्गासप्तशती में भी देवी की महिमा का एक मंत्र उजागर करता है कि पूरे ब्रह्माण्ड को शक्ति और ऊर्जा निराकार रूप में आदिशक्ति द्वारा ही मिलती है। लिखा है कि - 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।। 

जिसका मतबल यही है कि पंचतत्वों यानी आकाश, जल, वायु, अग्रि और पृथ्वी सहित सभी प्राणियों में बसी शक्तिरूपा व प्राणदायी देवी को बार-बार मेरा नमस्कार है। साफ है कि देवी ही ब्रह्माण्ड की अधिष्ठात्री है।

जानिए शाम व रात को शिव पूजा के चमत्कारी होने से जुड़ी ये खास बातें


भगवान शिव की उपासना और व्रत के विशेष काल और दिन में प्रदोष तिथि का बहुत महत्व है। प्रदोष काल यानी वह समय विशेष जहां दिन और रात का मिलन होता है। इसमें शिव पूजा का फल सभी सांसारिक इच्छाओं को पूरा करने वाला माना गया है। यही वजह है कि यह दिन, तिथि और व्रत प्रदोष के नाम से ही प्रसिद्ध है। प्रदोष व्रत हर हिन्दू माह के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन या त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है। कुछ मान्यताओं में द्वादशी एवं त्रयोदशी की तिथि को भी प्रदोष तिथि माना गया है। आज भी प्रदोष तिथि है। 
इसी प्रदोष तिथि के बारे में कामनापूर्ति की पूजा पंरपराओं के अलावा क्या आप जानते हैं कि शिव आराधना के लिए प्रदोष काल का इतना महत्व क्यों है? यहां बताए जा रहे हैं इससे जुड़े खास धार्मिक व व्यावहारिक पहलू - 
हिन्दू धर्मग्रंथों में भगवान शिव को तमोगुणी व विनाशक शक्तियों का स्वामी भी माना गया है। रात्रि भी तमोगुणी यानी तम या अंधकार भरी होती है। इसमें तामसी या बुरी शक्तियां हावी मानी जाती हैं, जो सांसारिक जीवों के लिए अशुभ व दुःखदायी मानी गई है। लोक भाषा में इन शक्तियों को ही भूत-पिशाच पुकारा जाता है, शास्त्रों में शिव को इन भूतगणों का ही स्वामी और भूतभावन बताया गया है। इन पर शिव का पूरा नियंत्रण होता है। इसलिए प्रदोष काल में शिव की पूजा इन बुरी शक्तियों के प्रभाव से बचाने वाली होती है। 
इस बात के व्यावहारिक पक्ष को समझें तो असल में, दिन के वक्त सूर्य की ऊर्जा और प्रकाश से शरीर ऊर्जावान बना रहता है, रोग पैदा करने वाले जीव भी निष्क्रिय रहते हैं। शरीर के स्वस्थ होने से मन व आत्मा में सत् यानी अच्छे विचारों के प्रवाह से बुरे या तामसी भावों का असर नहीं होता। शैव ग्रंथों में सूर्य को शिव का ही रूप माना गया है और शिव रूप वेद में भी सूर्य को जगत की आत्मा माना गया है। इस तरह सूर्य रूप शिव के प्रभाव से दिन में बुरी शक्तियां कमजोर हो जाती हैं। 
वहीं दिन ढलते ही सत्वगुणी प्रकाश के जाने और तमोगुणी अंधकार के आने से तन, मन के भावों में बदलाव आता है। बुरे और तामसी भावों के हावी होने से मन, विचार और व्यवहार के दोष भयंकर कलह और संताप पैदा करते हैं। यही दोष पैशाचिक प्रवृत्ति माने जाते हैं। इन पर प्रभावी और तुरंत नियंत्रण के लिए ही रात्रि के आरंभ में यानी प्रदोष काल में आसान उपायों से प्रसन्न होने वाले देवता और भूतों के स्वामी शिव यानी आशुतोष की पूजा बहुत ही शुभ और संकटनाशक मानी गई है। 
इसी भाव और श्रद्धा से यह मान्यता भी प्रचलित है कि शिव रात्रि के स्वामी हैं और प्रदोष काल यानी शाम के वक्त शिव कल्याण भाव से भ्रमण पर निकलते हैं। यहीं नहीं पौराणिक मान्यता भी है कि ज्योर्तिलिंग का प्राकट्य भी अर्द्धरात्रि में माना गया है। संकेत यही है कि अशुभ और बुराई से बचना है तो शुभ और कल्याण की भावनाओं से जुड़ें।

हजारों साल पहले ऋषियों के अविष्कार, पढ़कर रह जाएंगे हैरान


भारत की धरती को ऋषि, मुनि, सिद्ध और देवताओं की भूमि पुकारा जाता है। यह कई तरह के विलक्षण ज्ञान व चमत्कारों से अटी पड़ी है। सनातन धर्म वेद को मानता है। प्राचीन  ऋषि-मुनियों ने घोर तप, कर्म, उपासना, संयम के जरिए वेद में छिपे इस गूढ ज्ञान व विज्ञान को ही जानकर हजारों साल पहले ही कुदरत से जुड़े कई रहस्य उजागर करने के साथ कई अविष्कार किए व युक्तियां बताई। ऐसे विलक्षण ज्ञान के आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक होता है। 
कई ऋषि-मुनियों ने तो वेदों की मंत्र शक्ति को कठोर योग व तपोबल से साधकर ऐसे अद्भुत कारनामों को अंजाम दिया कि बड़े-बड़े राजवंश व महाबली राजाओं को भी झुकना पड़ा। 
जानिए ऐसे ही असाधारण या यूं कहें कि प्राचीन वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों द्वारा किए आविष्कार व उनके द्वारा उजागर रहस्यों को जिनसे आप भी अब तक अनजान होंगे – 
महर्षि दधीचि -
महातपोबलि और शिव भक्त ऋषि थे। वे संसार के लिए कल्याण व त्याग की भावना रख वृत्तासुर का नाश करने के लिए अपनी अस्थियों का दान करने की वजह से महर्षि दधीचि बड़े पूजनीय हुए। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि - 
एक बार देवराज इन्द्र की सभा देवगुरु बृहस्पति आए। अहंकार से चूर इन्द्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर चले गए। देवताओं ने विश्वरूप को अपना गुरू बनाकर काम चलाना पड़ा, किन्तु विश्वरूप देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे देता था। इन्द्र ने उस पर आवेशित होकर उसका सिर काट दिया। विश्वरूप, त्वष्टा ऋषि का पुत्र था उन्होंने क्रोधित होकर इन्द्र को मारने के लिए महाबली वृत्रासुर को पैदा किया। वृत्रासुर के भय से इन्द्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के इधर-उधर भटकने लगे।
ब्रह्मादेव ने वृत्तासुर को मारने के लिए वज्र बनाने के लिए देवराज इन्द्र को तपोबली महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियाँ मांगने के लिये भेजा। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए तीनों लोकों की भलाई के लिए उनकी हड्डियां दान में मांगी। महर्षि दधीचि ने संसार के कल्याण के लिए अपना शरीर दान कर दिया। महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र बना और वृत्रासुर मारा गया। इस तरह एक महान ऋषि के अतुलनीय त्याग से देवराज इन्द्र बचे और तीनों लोक सुखी हो गए। 
आचार्य कणाद - 
परमाणुशास्त्र के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।
भास्कराचार्य -
आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथमें पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि, ‘पृथ्वी आकाशीय  पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है । इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।
आचार्य चरक -
‘चरकसंहिता’ जैसा उपयोगी आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान,  औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज, ह्दय रोग व क्षय रोग जैसी बीमारियों के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर की। 
भारद्वाज -
आधुनिक विज्ञान के मुताबिक राइट बंधुओं ने वायुयान का अविष्कार किया। वहीं हिन्दू धर्म मान्यताओं के मुताबिक कई सदियों पहले ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र के जरिए वायुयान को गायब करने के असाधारण विचार से लेकर, एक ग्रह से दूसरे ग्रह व एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाने के रहस्य उजागर किए। इस तरह ऋषि भारद्वाज को वायुयान का अविष्कारक भी माना जाता है। 
कण्व -
 वैदिक कालीन ऋषियों में कण्व का नाम प्रमुख है। इनके आश्रम में ही राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला और उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था। माना जाता है कि उसके नाम पर देश का नाम भारत हुआ। सोमयज्ञ परंपरा भी को कण्व की देन माने जाते हैं। 
कपिल मुनि -
भगवान विष्णु का पांचवा अवतार माने जाते हैं। इनके पिता  कर्दम ऋषि थे। इनकी माता देवहूती ने विष्णु के समान पुत्र चाहा। इसलिए भगवान विष्णु ने खुद उनके गर्भ से पैदा हुए। कपिल मुनि 'सांख्य दर्शन' के प्रवर्तक माने जाते हैं। इससे जुड़ा प्रसंग है कि जब उनके पिता कर्दम संन्यासी बन जंगल में जाने लगे तो देवहूती खुद के अकेले रह जाने की स्थिति पर दुःख जताया। इस पर ऋषि कर्दम देवहूती को इस बारे में पुत्र से ज्ञान मिलने की बात कही। वक्त निकलने कपिल मुनि ने जो ज्ञान माता को दिया, वही 'सांख्य दर्शन' कहलाता है।
इसी तरह पावन गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने के पीछे भी कपिल मुनि का शाप भी संसार के लिए कल्याणकारी बना। इससे जुड़ा प्रसंग है कि भगवान राम के पूर्वज राजा सगर ने द्वारा किए गए यज्ञ का घोड़ा इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के करीब छोड़ दिया। तब घोड़े को खोजते हुआ वहां पहुंचे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। इससे कुपित होकर मुनि ने राजा सगर के सभी पुत्रों को शाप देकर भस्म कर दिया। बाद के कालों में राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या कर स्वर्ग से गंगा को जमीन पर उतारा और पूर्वजों को शापमुक्त किया। 
पतंजलि -
आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले हीं ऋषि पतंजलि ने कैंसर को रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है। 
शौनक :  
वैदिक आचार्य और ऋषि शौनक ने गुरु-शिष्य परंपरा व संस्कारों को इतना फैलाया कि उनको दस हजार शिष्यों के गुरुकूल वाले कुलपति होने का गौरव मिला। शिष्यों की यह तादाद कई आधुनिक विश्वविद्यालयों तुलना में भी कहीं ज्यादा थी। 
महर्षि सुश्रुत - ये शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है। 
जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद, पथरी,  हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे। 
वशिष्ठ :
वशिष्ठ ऋषि राजा दशरथ के कुलगुरु थे। दशरथ के चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने इनसे ही शिक्षा पाई। देवप्राणी व मनचाहा वर देने वाली कामधेनु गाय वशिष्ठ ऋषि के पास ही थी।
विश्वामित्र :
विश्वामित्र, ऋषि बनने से पहले क्षत्रिय थे। किंतु ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को पाने के लिए हुए युद्ध में मिली हार के बाद तपस्वी हो गए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से अस्त्र विद्या पाई। इसी कड़ी में माना जाता है कि आज के युग में प्रचलित प्रक्षेपास्त्र या मिसाइल प्रणाली हजारों साल पहले विश्वामित्र ने ही खोजी थी। 
ऋषि विश्वामित्र ही ब्रह्म गायत्री मंत्र के दृष्टा माने जाते हैं। विश्वामित्र का अप्सरा मेनका पर मोहित होकर तपस्या भंग होना भी प्रसिद्ध है। शरीर सहित त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का चमत्कार भी विश्वामित्र ने तपोबल से कर दिखाया
महर्षि अगस्त्य -
वैदिक मान्यता के मुताबिक मित्र और वरूण देवताओं का दिव्य तेज यज्ञ कलश में मिलने से उसी कलश के बीच से तेजस्वी महर्षि अगस्त्य प्रकट हुए। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी ऋषि थे। उनके तपोबल से जुड़ी पौराणिक कथा है कि एक बार जब समुद्री राक्षसों से प्रताड़ित होकर देवता महर्षि अगस्त्य के पास सहायता के लिए पहुंचे तो महर्षि ने देवताओं के दुःख को दूर करने के लिए समुद्र का सारा जल पी लिया। जिससे सारे राक्षसों का अंत हुआ।
गर्गमुनि -
गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। वे गर्गमुनि ही थे, जिनकी श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के के बारे नक्षत्र विज्ञान के आधार पर  जो कुछ भी बताया वह पूरी तरह सही साबित हुआ। मानवीय पहलू से कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी । इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था, यही तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्गमुनिजी ने पहले बता दिए थे। 
बौद्धयन -
भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह रके कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया|


Friday, 29 March 2013

मनुष्य का लगभग आधा जीवन सोने में व्यतीत होता है

मनुष्य का लगभग आधा जीवन सोने में व्यतीत होता है। हर मनुष्य का सोने का तरीका एक-दूसरे से भिन्न होता है। आपके सोने का तरीका आपके क्रियाकलापों, मन की बातों, आदतों एवं आपके विषय में बहुत कुछ सच-सच बता सकता है। सामुद्रिक शास्त्र या शरीर लक्षण विज्ञान के अंतर्गत इस संबंध में विस्तृत जानकारी मिलती है। इस संबंध में विस्तृत रूप से जानने के लिए आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें-
पांवों को कसकर सोना- समुद्र शास्त्र के अनुसार जो लोग सोते समय पांवों को जकड़ लेते हैं और जिन्हें सारे शरीर को ढककर सोने की आदत है, ऐसे लोगों का जीवन निश्चित रूप से संघर्षपूर्ण रहता है। ये परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं, यही इनकी सबसे बड़ी विशेषता होती है। ये बहुत ही व्यवहारकुशल होते हैं। ये सभी के साथ आसानी से घुलमिल जाते हैं।




शरीर सिकोड़कर सोना- ऐसे लोग डरपोक होते हैं। इनके मन में असुरक्षा की भावना होती है। इन्हें एक अंजाना सा भय अनुभव होता है वे यह बात किसी को बताते नहीं है। इन्हें अंजाने लोगों के साथ बात करना पसंद नहीं आता। ये अक्सर अकेले रहना पसंद करते हैं। ऐसे लोगों को नशे की लत लगने की संभावना सबसे अधिक होती है। कभी-कभी ये डिप्रेशन का शिकार भी हो जाते हैं।





चित्त सोना- अगर आपको केवल सीधे लेटकर नींद आती है तो यह शुभ लक्षण हैं। आप केवल आत्मविश्वासी ही नहीं आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी भी हैं। आप समस्याओं का समाधान तुरंत कर देते हैं। ऐसे लोग परिवार के मुख्य सदस्य होते हैं। कुछ भी बड़ा काम करने से पहले इन लोगों की राय जरुर ली जाती है। ये परिवार, समाज, दोस्तों व रिश्तेदारों में बहुत लोकप्रिय होते हैं।



पेट के बल सोना- समुद्र शास्त्र के अनुसार ऐसे लोगों में अंजान भय की भावना होती है। ये किसी भी प्रकार का खतरा उठाने के लिए तैयार नहीं होते। अपनी गलती को अच्छी तरह जानते हैं पर बतलाते हुए डरते हैं। जीवन में कई बार इन्हें धोखा मिलता है इसलिए ये बहुत ही सोच-समझकर किसी से दोस्ती करते हैं। पैसों के मामले में भी कई बार ये धोखे का शिकार हो जाते हैं।



पैर पर पैर रखकर सोना- अगर आप इस प्रकार सोते हैं तो आप संतुष्ट, सहनशील व तृप्त हैं। दूसरे प्रसन्न रहें, आप भी सुखी रहें। सदैव यह इच्छा आपके मन में होती है।  ऐसे लोगों का जीवन निश्चित रूप से सुखी रहता है। ये व्यर्थ की बातों पर ध्यान न देकर अपने काम से काम रखना पसंद करते हैं।




करवट लेकर सोना- ऐसे लोग समझौतावादी होते हैं। साफ-सुथरे रहना, अच्छा भोजन करना इन्हें प्रिय होता है। खोज करना इनका प्रमुख शौक होता है। ये आदर्श जीवन जीना पसंद करते हैं।

सोने से पहले पैर हिलाना-  कुछ लोग सोने से पहले पैर हिलाते हैं लेकिन अच्छा लक्ष्ण नहीं माना जाता। ऐसे लोगों को सदैव कोई न कोई चिंता सताती रहती है। ये स्वयं से ज्यादा परिजनों के बारे में सोचते हैं।
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2013 के 9 महीने शेष: जानिए किस पर है शनि की बुरी नजर और उपाय

ब्रह्मांड का सबसे रहस्मय ग्रह शनि साल 2013 में तुला राशि में चलायमान रहेगा। इस साल शनि अपनी उच्च राशि(तुला) में परिभ्रमण कर, विभिन्न राशियों को भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रभावित करेगा।
आइए देखें शनि किस प्रकार से आपकी राशि को प्रभावित करेगा। किन-किन राशियों को शनि की इस वर्ष साढ़ेसाती और किन राशियों पर ढैय्या रहेगी। किन राशियों के लिए शनि शुभ रहेगा व किन राशियों के लोगों को शनि के प्रकोप का सामना करना पड़ेगा-
मेष राशि
इस साल शनिदेव आपकी राशि से सातवें स्थान में चलायमान हैं। आपकी राशि पर शनि की दृष्टि मानसिक तनाव देगी। आर्थिक मामलों में भी नुकसान होने की संभावना है।
कारोबार में आपको ध्यान रखने की जरुरत है, शत्रुजन्य पीड़ा व कष्ट की स्थिति रहेगी। इस साल आपको अजनबी लोगों से सावधान रहना चाहिए। शनि के कारण पति-पत्नी में तनाव व गलतफहमियां हो सकती हैं। स्वास्थ्य में लापरवाही के परिणाम घातक हो सकते हैं। नौकरी में बॉस के साथ संबंध सामान्य नहीं रह पाएंगे
वृषभ राशि
इस साल शनिदेव आपकी राशि से छठे स्थान पर रहेंगे। व्यापारिक व कामकाज की दृष्टि से समय गति आपके पक्ष में है। काफी समय से जो काम रुके पड़े हैं वो इस साल पूरे हो जाएंगे। शत्रुओं से सावधान रहने की जरुरत हैं।
आर्थिक व करियर की दृष्टि से साल 2013 आपके लिए अच्छा रहेगा। 18 फरवरी से 20 जुलाई 2013 के मध्य शनि की वक्र गति परिवार में तनाव व कलह की स्थिति पैदा करेगी। जुलाई के बाद मार्गी शनि के प्रभाव से परिवार में कोई मांगलिक कामिथुन राशि
इस साल शनि की स्थिति साल भर पंचम भाव में रहेगी जो कि पारिवारिक चिंता व विशेष रूप से संतान को लेकर कष्ट की स्थिति दर्शा रही है। संतान के करियर, अध्ययन व विवाह को लेकर सालभर चिंता बनी रहेगी।
कामकाज व व्यापार में कई काम बनते-बनते रुक जाएंगे। इस समय गुप्त शत्रुओं से सावधान रहने की आवश्यकता है। करियर व रोजगार में भी लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव बना रहेगा हालांकि स्वास्थ्य की दृष्टि से शनि का यह परिभ्रमण ठीक रहेगा।र्यक्रम होगा।
कर्क राशि
इस साल कर्क राशि को शनि की ढैय्या की स्थिति चल रही है। शनि के कारण इस साल कामकाज व व्यापार में जी-तोड़ मेहनत करने के बाद भी परिणाम शून्य ही मिलेगा। 18 फरवरी से 20 जुलाई 2013 के मध्य शनि की वक्र गति आपके नुकसान का कारण बनेगी।
परिवार में गलतफहमियां रहेंगी। अकारण ही घर में तनावपूर्ण व क्लेशपूर्ण माहौल बना रहेगा। खर्चों पर नियंत्रण रखें अन्यथा किसी से उधार लेने की नौबत आ सकती है। भविष्य व करियर से जुड़ी योजनाएं पूरी नहीं हो पाएंगी।

उपाय- शनि दोष की शांति के लिए कर्क राशि के लोग 7 प्रकार के अनाज व दालों का मिश्रण पक्षियों को चुगाएं व काले घोड़े की नाल की अंगुठी मध्यमा अंगुली में धारण करें।
सिंह राशि
साल 2013 में शनि का तीसरे भाव में परिभ्रमण आपके लाभ के मार्ग खोल देगा। यह साल आपकी उन्नति का है। व्यापार व नौकरी में आय के स्त्रोतो में वृद्धि होगी। भाइयों में बंटवारे व संपत्ति को लेकर विवाद हो सकता है लेकिन भावनात्मक रूप से संभालने पर यह विवाद सुलझ जाएगा।
फरवरी से जुलाई के मध्य शनि की वक्र गति के कारण विद्यार्थियों को कुछ परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इस साल अपनी मेहनत के बल पर आप हर इच्छा पूरी कर सकेंगे। शनिदेव इस साल आप पर पूरी तरह से मेहरबान रहेंगे।

उपाय- शनिवार के दिन शनि महाराज को तेल चढ़ाएं और ऊँ शं श्नैश्चराय नम: मंत्र की 1 माला जप प्रत्येक शनिवार को करें।
कन्या राशि
साल 2013 में शनिदेव की कृपा आप पर नहीं रहेगी। इस साल आप पर शनि की साढ़ेसाती साल भर रहेगी, जिसमें दूसरे भाव में शनिदेव आपसे आय से अधिक खर्च कराएंगे। अगर आप नौकरीपेशा हैं तो काम में लापरवाही घातक हो सकती है।
एक ओर शनि की साढ़ेसाती तथा दूसरी ओर साल भर राहु की स्थिति आपके लिए नुकसानदायक रहेगी। 18 फरवरी से 20 जुलाई 2013 के मध्य शनि की वक्र गति से किसी रिश्तेदार या निकट मित्र से संबंधित कोई अशुभ समाचार मिल सकते हैं।

उपाय- शनि के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए सवा चार रत्ती का कटैला युक्त शनि यंत्र गले में धारण करें।
तुला राशि
इस साल शनि की साढ़ेसाती आपकी राशि पर साल भर रहेगी। इस साल कामकाज में काफी संघर्षपूर्ण स्थिति रहेगी। शत्रु व विरोधी हावी होंगे। निवेश किए हुए रुपए डूबने की स्थिति बन सकती है। 18 फरवरी से 20 जुलाई 2013 के मध्य शनिदेव वक्र गति में रहेंगे।
इस समय स्वास्थ्य को लेकर कोई गंभीर समस्या आ सकती है। 20 जुलाई के बाद जीवन की गाड़ी एक बार फिर से पटरी पर दौड़ेगी हालांकि साढ़ेसाती तो चलायमान रहेगी परंतु थोड़ी सी राहत जरुर मिल जाएगी।

उपाय- शनि की साढ़ेसाती से बचने के लिए शनि मुद्रिका(घोड़े के नाल की अंगुठी) धारण करें।
वृश्चिक राशि
इस साल आपकी राशि पर शनि की साढ़ेसाती चल रही है। बारहवें भाव में शनि की परिभ्रमण आपके लिए मुश्किलों व संघर्षों का पहाड़ लेकर आ रहा है।  2013 में एक तरफ व्यापार व नौकरी में उतार-चढ़ाव व दूसरी ओर स्वास्थ्य की परेशानी आपको परेशान कर देगी।
18 फरवरी से 20 जुलाई 2013 के मध्य शनि की वक्र गति से आपको कुछ राहत जरुर मिल सकती है। कोई महत्वपूर्ण कार्य इस दौरान होगा। 20 जुलाई से दिसंबर के मध्य किसी अप्रिय घटना के घटित होने की संभावना है।

उपाय- शनि के दुष्प्रभाव से शांति के लिए काले घोड़े की नाल से बनी अंगुठी मध्यमा अंगुली में धारण करें व शनिदेव को तिल व तेल चढ़ाएं।
धनु राशि
साल 2013 में शनिदेव आपकी राशि में ग्यारहवे स्थान में चलायमान होकर लाभ के मार्ग खोल देंगे। आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। शुभ समाचार मिलेंगे। फरवरी से जुलाई के मध्य शनि की वक्र गति के कारण स्वास्थ्य में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
शत्रु व विरोधी आपसे ईष्र्या करेंगे लेकिन घबराने की कोई जरुरत नहीं है। जुलाई में एक बार फिर शनि मार्गी होकर लाभ का मार्ग प्रशस्त करेंगे। आप सफलता की राह पर बढ़ते चले जाएंगे। कामकाज में विस्तार को लेकर कोई योजना बन सकती है।

उपाय- शनि के शुभ प्रभाव का पूरा लाभ उठाने के लिए काले घोड़े की नाल की अंगुठी मध्यमा अंगुली में धारण करें।
मकर राशि
साल 2013 में शनिदेव आपकी राशि से दशम स्थान में गोचरवश चलायमान रहेंगे। दशम भाव का शनि रोजगार व कामकाज में कष्ट की स्थिति बनाता है। लाख मेहनत करने के बाद भी आपको उसका फल नहीं मिलेगा। फरवरी से जुलाई के मध्य शनि की वक्र गति कोर्ट केस व सरकारी प्रपंचों में आपको उलझाए रखेगी।
करिअर में योग्यता व मेहनत के अनुसार फल नहीं मिलने से मन उदास रहेगा। पैसों के लेन-देन को लेकर किसी पर भी भरोसा न करें, कोई करीबी आपको धोखा दे सकता है।

उपाय- शनि के प्रकोप को शांत करने के लिए शनियंत्र गले में धारण करें व शनिदेव को तेल चढ़ाएं।
कुंभ राशि
साल 2013 में शनि की स्थिति आपकी राशि में नवम स्थान पर रहेगी। नवम भाव स्थान का शनि का धन नाश के संकेत दे रहा है। निवेश किया धन डूब सकता है। पारिवारिक परेशानियों का सामना भी करना पड़ सकता है।
व्यापार को लेकर बड़ी योजनाएं बनाएंगे लेकिन इस साल उनका पूरा होना संभव नहीं है। परिवार में संतान के अध्ययन, करियर व विवाह को लेकर चिंता की स्थितियां बनेगी। आमदनी अठन्नी व खर्चा रुपय्या वाली स्थिति से परेशान रहेंगे। किसी से धन उधार लेना पड़ सकता है।

उपाय- शनि के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए नीलम युक्त शनियंत्र धारण करें।
मीन राशि
2013 में शनि की ढैय्या मीन राशि वालों पर साल भर रहेगी। इस वर्ष शनिदेव गोचरवश आठवें स्थान में परिभ्रमण करेंगे। प्रत्येक काम में रुकावट व बाधा की स्थिति बनेगी। स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ेगा। 18 फरवरी से 20 जुलाई के मध्य विशेष सावधानी रखें।
किसी अजनबी पर भरोसा न करें। पारिवारिक सुख शांति के लिहाज से भी समय अच्छा नहीं है। माता-पिता या घर के अन्य बुजुर्गों की बीमारी पर खर्च होने की संभावना है। व्यापार में लापरवाही कोई बड़ा नुकसान करा सकती है।

उपाय- शनि की ढैय्या के प्रभाव को शांत करने के लिए नीलमयुक्त शनियंत्र गले में धारण करें।

खून से 500 बार अभिषेक, 3100 तिलक लगाने पर भी 'प्रकट' नहीं हुए शिव तो पूरे परिवार ने खाया जहर


गंगापुर सिटी। राजस्‍थान में तंत्र विद्या और अंधविश्वास के चक्कर में एक ही परिवार के 8 लोगों के जहर खा लेने की घटना से जुड़ी खौफनाक जानकारियां सामने आई हैं। परिवार के जिन पांच लोगों की इस घटना में मौत हो गई, उनमें से कंचन सिंह राजपूत पेशे से फोटोग्राफर था। वह तंत्र-मंत्र में विश्वास करता था। उसने 'ईश्वर से साक्षात्कार' की योजना बनाई और पूरी घटना की वीडियो रिकॉर्डिग की। रोंगटे खड़े करने वाली इस रिकॉर्डिग में पूरी घटना का एक-एक पल दर्ज है। (तस्‍वीरों में देखें, पूरा घटनाक्रम)
सोमवार रात नसिया कॉलोनी के कंचन सिंह राजपूत और उसके परिवार के सभी सदस्यों ने भगवान शिव का आह्वान कर सशरीर साक्षात्कार करने के लिए हवन किया। अपने खून से भगवान शिव को कई बार नहलाने, खून में भिगोकर हवन में कई चीजों की आहुतियां देने के बाद भी जब शिव प्रकट नहीं हुए तो सभी ने यह विचार कर मावे के लड्डू में जहर खा लिया कि यदि भगवान प्रकट नहीं होते हैं तो वे मौत को गले लगाकर उनके पास चले जाएंगे। 
वीडियो में परिवार के सभी लोग हंसते-हंसते लड्डू में जहर मिला कर खाते दिख रहे हैं। रिकॉर्डिग में अपने खून से भगवान शिव को कई बार नहलाने, खून में भिगोकर हवन में कई चीजों की आहुतियां देने, खून निकालने के लिए मेडिकल सीरिंज और उसका पूरा डिब्बा दिखाई दे रहा है। 
जहर मिले लड्डू खाने के बाद कंचन सिंह (45), उसकी पत्नी नीलम (40), पुत्री ड्रीमी (16), पुत्र प्रद्युम्न (11) और छोटे भाई दीपसिंह (40) की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि कंचन की मां भगवती, दीपसिंह का बेटा लव सिंह और भांजी रश्मि अचेत हो गए। रश्मि को होश आया तो उसने पुलिस और एंबुलेंस को फोन करने के बाद पड़ोसियों को घटना की जानकारी दी। पड़ोसियों के सहयोग से पुलिस ने सभी को अस्‍पताल पहुंचाया।
वीडियो रिकॉर्डिग में भगवान के अवतरित नहीं होने पर सायनाइड खाकर जान देने की बात तो है ही, पूरे परिवार ने मौत के बाद के कार्यक्रम के बारे में भी बताया है। वीडियो रिकॉर्डिग में उल्लेख है कि भांजी रश्मि की 12 अप्रैल को होने वाली शादी स्वर्ग में ही करेंगे।

भगवान शिव का सीरियल देखा, फिर की उनसे मिलने की बात
वीडियो रिकॉर्डिंग के अनुसार कंचन सिंह के परिवार के सभी सदस्यों ने सबसे पहले भगवान शिव व पार्वती का टीवी पर सीरियल देखा। इसके बाद सभी सदस्यों ने भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी फिर सभी एक कमरे में बैठ गए और हंसी मजाक करते रहे। सभी एक-दूसरे से पूछ रहे थे कि उनकी मौत होने के बाद स्वर्ग में जाने पर कैसा लगेगा। कंचन सिंह ने कहा कि भगवान शिव, दुर्गा माता व अन्य देवी-देवताओं से हमारी रोजाना बात होती है। मैं और मेरा भाई अब तक भगवान भोलेनाथ का 500 से अधिक बार खून से अभिषेक कर चुके हैं और 3100 से अधिक बार खुद के खून से तिलक किया है। घटना के दिन भी परिवार के सभी सदस्यों ने पहले तो खुद के खून से भोलेनाथ का अभिषेक किया और इसके बाद बच्चों ने अपने खून से तिलक लगाया।

आफरीन, आफरीन ! ये रहीं यूसुफ पठान की बेगम


होली के दिन जहां पूरा भारत रंगों की मस्ती में डूबा था, वहीं क्रिकेटर यूसुफ पठान ने अपना नया जीवन शुरू किया। यूसुफ ने बुधवार को अपनी मंगेतर आफरीन के साथ निकाह कर लिया। तीस साल के क्रिकेटर ने पिछले साल नादियाड में निजी समारोह में सगाई की थी। पठान का दिल चुराने वाली आफरीन मुंबई की हैं और वड़ोदरा में फिजियोथेरेपिस्ट हैं। 
 
निकाह के मौके पर युसूफ ने जोधपुरी जूतियां पहनी थी। इसके लिए उन्होंने जोधपुर के रमेश पप्पू चौहान को तीन जोड़ी जूतियां बनाने का संदेश भेजा गया था। पठान ने दो जोड़ी जेंट्स की जूतियां और एक जोड़ी लेडीज जूती बनाने का आग्रह किया था। इन जूतियों में जरी का काम हुआ था। होगा। उल्लेखनीय है कि पप्पू अभिषेक बच्‍चन, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर,पार्थिव पटेल के लिए शादी की जूतियां बना चुके हैं। इनके अलावा अमिताभ बच्‍चन व सचिन तेंडुलकर को भी पप्पू की बनाई जोधपुरी जूतियां पसंद हैं।
 
गौरतलब है कि कुछ समय से टीम इंडिया से बाहर चल रहे पठान ने अब तक 57 वनडे में 1365 रन और 22 टी-20 में 438 रन बनाए हैं। अब उम्‍मीद की जा रही है कि यूसुफ पठान के छोटे भाई इरफान पठान की शादी का भी रास्‍ता साफ हो गया है। इरफान ने अपने भाई की शादी में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आमंत्रित किया था।