Friday, 12 April 2013

जानिए शाम व रात को शिव पूजा के चमत्कारी होने से जुड़ी ये खास बातें


भगवान शिव की उपासना और व्रत के विशेष काल और दिन में प्रदोष तिथि का बहुत महत्व है। प्रदोष काल यानी वह समय विशेष जहां दिन और रात का मिलन होता है। इसमें शिव पूजा का फल सभी सांसारिक इच्छाओं को पूरा करने वाला माना गया है। यही वजह है कि यह दिन, तिथि और व्रत प्रदोष के नाम से ही प्रसिद्ध है। प्रदोष व्रत हर हिन्दू माह के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन या त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है। कुछ मान्यताओं में द्वादशी एवं त्रयोदशी की तिथि को भी प्रदोष तिथि माना गया है। आज भी प्रदोष तिथि है। 
इसी प्रदोष तिथि के बारे में कामनापूर्ति की पूजा पंरपराओं के अलावा क्या आप जानते हैं कि शिव आराधना के लिए प्रदोष काल का इतना महत्व क्यों है? यहां बताए जा रहे हैं इससे जुड़े खास धार्मिक व व्यावहारिक पहलू - 
हिन्दू धर्मग्रंथों में भगवान शिव को तमोगुणी व विनाशक शक्तियों का स्वामी भी माना गया है। रात्रि भी तमोगुणी यानी तम या अंधकार भरी होती है। इसमें तामसी या बुरी शक्तियां हावी मानी जाती हैं, जो सांसारिक जीवों के लिए अशुभ व दुःखदायी मानी गई है। लोक भाषा में इन शक्तियों को ही भूत-पिशाच पुकारा जाता है, शास्त्रों में शिव को इन भूतगणों का ही स्वामी और भूतभावन बताया गया है। इन पर शिव का पूरा नियंत्रण होता है। इसलिए प्रदोष काल में शिव की पूजा इन बुरी शक्तियों के प्रभाव से बचाने वाली होती है। 
इस बात के व्यावहारिक पक्ष को समझें तो असल में, दिन के वक्त सूर्य की ऊर्जा और प्रकाश से शरीर ऊर्जावान बना रहता है, रोग पैदा करने वाले जीव भी निष्क्रिय रहते हैं। शरीर के स्वस्थ होने से मन व आत्मा में सत् यानी अच्छे विचारों के प्रवाह से बुरे या तामसी भावों का असर नहीं होता। शैव ग्रंथों में सूर्य को शिव का ही रूप माना गया है और शिव रूप वेद में भी सूर्य को जगत की आत्मा माना गया है। इस तरह सूर्य रूप शिव के प्रभाव से दिन में बुरी शक्तियां कमजोर हो जाती हैं। 
वहीं दिन ढलते ही सत्वगुणी प्रकाश के जाने और तमोगुणी अंधकार के आने से तन, मन के भावों में बदलाव आता है। बुरे और तामसी भावों के हावी होने से मन, विचार और व्यवहार के दोष भयंकर कलह और संताप पैदा करते हैं। यही दोष पैशाचिक प्रवृत्ति माने जाते हैं। इन पर प्रभावी और तुरंत नियंत्रण के लिए ही रात्रि के आरंभ में यानी प्रदोष काल में आसान उपायों से प्रसन्न होने वाले देवता और भूतों के स्वामी शिव यानी आशुतोष की पूजा बहुत ही शुभ और संकटनाशक मानी गई है। 
इसी भाव और श्रद्धा से यह मान्यता भी प्रचलित है कि शिव रात्रि के स्वामी हैं और प्रदोष काल यानी शाम के वक्त शिव कल्याण भाव से भ्रमण पर निकलते हैं। यहीं नहीं पौराणिक मान्यता भी है कि ज्योर्तिलिंग का प्राकट्य भी अर्द्धरात्रि में माना गया है। संकेत यही है कि अशुभ और बुराई से बचना है तो शुभ और कल्याण की भावनाओं से जुड़ें।

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